कार्यक्रम का आयोजन पंडित भगवत दयाल शर्मा स्वास्थ्य विज्ञान विश्वविद्यालय के मनोरोग विभाग द्वारा सप्तरंग संस्था के सहयोग से किया गया। अभियान का मुख्य उद्देश्य आम लोगों तक यह संदेश पहुंचाना है कि मानसिक बीमारी कोई अभिशाप या कलंक नहीं है और इससे पीड़ित व्यक्ति को समाज से अलग-थलग नहीं करना चाहिए।
कार्यक्रम में मुख्य वक्ता के तौर पर मनोरोग विभाग की अध्यक्ष एवं आईएमएचएस की निदेशक कम सीईओ डॉ. सुजाता सेठी ने कहा कि समाज में मानसिक बीमारियों को लेकर जो हीनभावना और कलंक है, वही सबसे बड़ी बाधा है।
डॉ. सुजाता सेठी ने कहा कि अक्सर लोग मानसिक बीमारी को पागलपन या पिछले जन्म के कर्मों से जोड़ देते हैं, जिससे मरीज और उसका परिवार टूट जाता है। उन्होंने चिंता जताते हुए कहा कि 10 में से 8 मरीज इसी कलंक और शर्म के कारण इलाज के लिए अस्पताल तक नहीं पहुंच पाते और अंदर ही अंदर घुटते रहते हैं।
डॉ. सेठी ने कहा कि इस कलंक को हम सब मिलकर खत्म कर सकते हैं। इसके लिए हमें तीन चीजें बदलनी होंगी - शब्द, सोच और व्यवहार। मानसिक रोगियों के लिए 'पागल' जैसे शब्दों का प्रयोग बंद करना होगा, उनके प्रति अपनी राय बदलनी होगी और उन्हें बराबरी, सम्मान और गरिमा देनी होगी। उन्होंने कहा कि मानसिक रोग भी डायबिटीज और बीपी की तरह ही एक बीमारी है, जिसका पूरा इलाज संभव है।
कार्यक्रम में डॉ. आयुषी और डॉ. संदीप ने मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े आम मिथकों को तोड़ा। उन्होंने बताया कि जादू-टोना, झाड़-फूंक से मानसिक रोग ठीक नहीं होता, बल्कि इससे समय बर्बाद होता है और बीमारी बढ़ जाती है। डॉक्टरों ने कहा कि अगर नींद न आना, लगातार उदासी, घबराहट, चिड़चिड़ापन या नशे की लत जैसे लक्षण दिखें तो तुरंत मनोचिकित्सक से मिलना चाहिए। शुरुआती दौर में ही पहचान और इलाज से मरीज पूरी तरह ठीक हो सकता है।
इस जागरूकता कार्यक्रम का सफल संयोजन सप्तरंग संस्था के श्री रमणीक मोहन ने किया। इस अवसर पर संस्था की मुकेश, परमिंदर सिंह, अविनाश और देवेंद्र सहित स्कूल के शिक्षक और बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएं मौजूद रहे। कार्यक्रम के अंत में सभी ने मानसिक रोगियों को सम्मान देने और समाज में जागरूकता फैलाने का संकल्प लिया।